“जिसने जंगल बचाया, अधिकार भी उसी का”, वन अधिकार कानून पर सुदेश महतो ने रखी बात
“आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष और झारखंड के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश कुमार महतो ने वन अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया. अनगड़ा में आयोजित सम्मेलन में उन्होंने कहा कि जल-जंगल-जमीन पर पीढ़ियों से निर्भर और उनका संरक्षण करने वाले स्थानीय समुदायों की वन प्रबंधन में भागीदारी सुनिश्चित. ”

Ranchi: आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष और झारखंड के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश कुमार महतो ने वन अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर जोर दिया है. रांची के अनगड़ा स्थित सीताफॉल पार्किंग स्थल में सामुदायिक वन पालन संस्थान (ICFG) के तत्वावधान में आयोजित प्रखंड स्तरीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि वन अधिकार केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन से जुड़े समुदायों के अधिकार, सम्मान और आजीविका का विषय है. उन्होंने कहा कि जिन समुदायों ने पीढ़ियों से जंगलों का संरक्षण किया है, उन्हें वन संरक्षण और प्रबंधन की निर्णय प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता. सम्मेलन में सामुदायिक भागीदारी, महिलाओं की भूमिका और वन अधिकार कानून के जमीनी क्रियान्वयन पर चर्चा हुई.
वन संरक्षण में स्थानीय समुदाय की भागीदारी जरूरी
सुदेश महतो ने कहा कि झारखंड के जंगल सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि यहां के लोगों की जीवन-व्यवस्था, संस्कृति, परंपरा और आजीविका का महत्वपूर्ण आधार हैं. उनके मुताबिक, जिन समुदायों ने पीढ़ियों से जंगलों को बचाने में भूमिका निभाई है, उन्हें वन संरक्षण की व्यवस्था से अलग रखकर स्थायी परिणाम हासिल नहीं किए जा सकते. उन्होंने वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन को महज कागजी प्रक्रिया या सरकारी औपचारिकता तक सीमित नहीं रखने की बात कही. उन्होंने कहा कि अधिकारों की पहचान, उनका वास्तविक हस्तांतरण और ग्राम स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में समुदाय की भागीदारी, तीनों पहलुओं पर एक साथ काम करने की जरूरत है. उन्होंने स्थानीय अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को वन संरक्षण की नीतियों में महत्व देने की बात भी कही. सम्मेलन में सामुदायिक वन संरक्षण और स्थानीय अधिकारों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई.
महिलाओं की नेतृत्वकारी भूमिका पर भी दिया जोर
सुदेश महतो ने वन अधिकार और सामुदायिक वन प्रबंधन में महिलाओं की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि ग्रामीण और वन क्षेत्रों में महिलाएं लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा सामुदायिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान देती रही हैं. इसलिए उन्हें केवल भागीदार के तौर पर नहीं, बल्कि नेतृत्वकारी भूमिका में आगे लाने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान केवल खनिज संपदा से नहीं, बल्कि जंगल, जमीन, संस्कृति, आदिवासी जीवन-दर्शन और सामुदायिक मूल्यों से भी जुड़ी है. विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए स्थानीय समुदायों के अधिकारों और हितों को ध्यान में रखना जरूरी है. कार्यक्रम से पहले पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा की पुण्यतिथि पर उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी गई. सम्मेलन में डॉ. संजय बसुमलिक, पूर्व मंत्री रामचंद्र सहिस, जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, महिला समूहों के प्रतिनिधि और स्थानीय लोग मौजूद रहे.


