पेसा नियमावली पर चंपाई सोरेन का तीखा हमला, कहा- कानून आया, लेकिन उसकी आत्मा खत्म कर दी गई
पेसा नियमावली को लेकर झारखंड की राजनीति गरमा गई है. पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने राज्य सरकार पर आदिवासियों के अधिकार कमजोर करने और पेसा कानून की मूल भावना से खिलवाड़ का आरोप लगाया है.

Ranchi: झारखंड में पेसा कानून की नियमावली जारी होते ही सियासी हलचल तेज हो गई है. पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता चंपाई सोरेन ने इस अधिसूचना को लेकर राज्य सरकार पर कड़ा प्रहार किया है. उन्होंने कहा कि जिस कानून को आदिवासियों को सशक्त करने के लिए लाया गया था, उसी कानून की आत्मा को नियमावली के जरिए कमजोर कर दिया गया है. रांची स्थित अपने आवास पर मीडिया से बातचीत करते हुए चंपाई सोरेन ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए और इसे आदिवासी समाज के साथ “सबसे बड़ा विश्वासघात” बताया.
चंपाई सोरेन ने कहा कि पेसा कानून 1996 में लागू हुआ था, लेकिन झारखंड में इसकी नियमावली बनने में 25 साल से अधिक का समय लग गया. उन्होंने आरोप लगाया कि इतने लंबे इंतजार के बाद जो नियमावली लाई गई है, वह पेसा कानून की मूल भावना से पूरी तरह भटकी हुई है. उनका कहना था कि अधिसूचना जारी करना सिर्फ औपचारिकता नहीं होनी चाहिए थी, बल्कि इसके जरिए आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को मजबूत किया जाना चाहिए था.
गठबंधन सरकार पर सीधा हमला
पूर्व मुख्यमंत्री ने झामुमो–कांग्रेस–राजद गठबंधन पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य में सबसे लंबा शासन इसी गठबंधन का रहा है. बावजूद इसके, सरकार पेसा कानून को सही तरीके से लागू करने में असफल रही. उन्होंने कहा कि सत्ता में रहते हुए सरकार को आदिवासी हितों की रक्षा करनी चाहिए थी, लेकिन नियमावली के शब्दों से ही यह साफ हो जाता है कि अधिकारों को सीमित करने की कोशिश की गई है.
शेड्यूल एरिया के अधिकारों पर सवाल
चंपाई सोरेन ने दावा किया कि नियमावली के शुरुआती हिस्से में ही शेड्यूल एरिया में रहने वाले आदिवासी और मूलवासी समुदायों के अधिकारों को कमजोर कर दिया गया है. उन्होंने कहा कि ग्रामसभा को जो ताकत मिलनी चाहिए थी, वह स्पष्ट रूप से नहीं दी गई. इससे यह संदेह पैदा होता है कि भविष्य में आदिवासियों की जमीन और संसाधनों पर खतरा बढ़ सकता है.
“आदिवासी समाज के भरोसे का दुरुपयोग”
भाजपा नेता ने कहा कि आदिवासी समाज सरल और भरोसेमंद होता है. सरकार ने इसी भरोसे का फायदा उठाकर नियमावली को ऐसे शब्दों में तैयार किया है, जिसे आम लोग आसानी से समझ नहीं पाएंगे. उन्होंने आरोप लगाया कि जनता को यह बताने की कोशिश ही नहीं की गई कि उनके संवैधानिक अधिकारों में क्या बदलाव किया गया है और इसका असर भविष्य में क्या होगा.
नियमावली के खिलाफ बड़ा आंदोलन तय
चंपाई सोरेन ने ऐलान किया कि पेसा नियमावली के विरोध में बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा. उन्होंने कहा कि मानकी और मुंडा समाज के लोग अब खुलकर विरोध में सामने आने लगे हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि जल्द ही रांची में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जहां हजारों लोगों के सामने नियमावली की प्रति फाड़ी जाएगी.
गांव-गांव जाकर लोगों को किया जाएगा जागरूक
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि सिर्फ शहरों में नहीं, बल्कि गांव-गांव जाकर लोगों को बताया जाएगा कि किस तरह से आदिवासियों की पुस्तैनी जमीन और अधिकारों को कमजोर करने की साजिश रची जा रही है. उनका कहना था कि जब तक आदिवासी समाज पूरी तरह जागरूक नहीं होगा, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी.
टाटा लीज और चांडिल डैम का भी जिक्र
चंपाई सोरेन ने टाटा की जमीन लीज का मुद्दा उठाते हुए कहा कि किसी भी हाल में इसे आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा. उन्होंने चांडिल डैम का उदाहरण देते हुए कहा कि इस परियोजना के कारण 116 गांव उजड़ गए थे. उन्होंने साफ किया कि अगर जरूरत पड़ी तो इस मुद्दे पर भी विरोध और तेज किया जाएगा.

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