केंद्र पर वित्तीय दबाव का आरोप, झारखंड सरकार बोली—हाथ फैलाने की नौबत नहीं आने देंगे
झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में वित्तीय मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली. वित्त मंत्री ने केंद्र पर कर हिस्सेदारी में कटौती का आरोप लगाया, जबकि विपक्ष ने बजट खर्च, किसानों के मुआवजे और सरकारी योजनाओं पर सवाल उठाए.

Ranchi: बजट सत्र के दौरान झारखंड की राजनीति में वित्तीय अधिकारों और आर्थिक प्रबंधन को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। राज्य के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी को समय पर न देना या उसमें कटौती करना एक सुनियोजित दबाव की रणनीति है। उन्होंने स्पष्ट किया कि झारखंड अपनी वित्तीय व्यवस्था को इस तरह मजबूत करेगा कि केंद्र के सामने निर्भरता की स्थिति न बने। वहीं, विपक्ष ने सरकार की वित्तीय कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए खर्च की गति, किसानों को मुआवजा और बुनियादी सेवाओं की स्थिति को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया। तृतीय अनुपूरक बजट, ऋण सीमा और विकास परियोजनाओं की प्रगति को लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच बहस तेज हो गई है, जिससे यह बजट सत्र राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम बन गया है।
ऋण सीमा पर सरकार का बचाव
वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने कहा कि राज्य को मिलने वाली केंद्रीय कर हिस्सेदारी में देरी और कटौती की कोशिशें संघीय ढांचे के खिलाफ हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि झारखंड अपनी राजस्व क्षमता बढ़ाकर वित्तीय आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ेगा। तृतीय अनुपूरक बजट के तहत करीब 6450 करोड़ रुपये की व्यवस्था मुख्य रूप से पूर्व प्रतिबद्ध देनदारियों के भुगतान के लिए की गई है और सरकार का दावा है कि वित्तीय वर्ष समाप्त होने से पहले 90 प्रतिशत से अधिक राशि खर्च कर ली जाएगी। विपक्ष के कटौती प्रस्ताव का जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि झारखंड ने FRBM एक्ट के तहत केवल 2.2 प्रतिशत ऋण लिया है, जो निर्धारित सीमा से काफी कम है। उन्होंने यह भी बताया कि राज्य के पास अभी भी हजारों करोड़ रुपये तक अतिरिक्त ऋण लेने की क्षमता मौजूद है, जिससे विकास योजनाओं को गति दी जा सकती है।
विपक्ष का पलटवार
विपक्षी विधायकों ने सरकार की वित्तीय प्रबंधन क्षमता पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि मूल बजट का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाया, जिसके कारण बार-बार अनुपूरक बजट लाने की नौबत आई। किसानों के मुद्दे को उठाते हुए कहा गया कि प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुकसान का मुआवजा अब तक नहीं मिला और धान खरीद व्यवस्था भी सुस्त है, जिससे किसानों को कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ रही है। इसके अलावा कई सरकारी भवनों के उपयोग में न आने, अस्पतालों में सुविधाओं की कमी और एंबुलेंस सेवा की उपलब्धता पर भी सवाल उठाए गए। पर्यटन परियोजनाओं की धीमी प्रगति का मुद्दा भी सदन में गूंजा। इन आरोपों और जवाबों के बीच बजट सत्र में वित्तीय अनुशासन, विकास प्राथमिकताओं और केंद्र-राज्य संबंधों पर सियासी बहस और तेज होती दिख रही है।

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