महाराष्ट्र की राजनीति में जब-जब सत्ता बदली है, तब-तब पुराने फैसलों और कार्रवाईयों पर सवाल उठे हैं. लेकिन जो मामला हाल के दिनों में सामने आया है, वह सिर्फ राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि पुलिस तंत्र की भूमिका, जांच एजेंसियों के दुरुपयोग और सत्ता के दबाव जैसे गंभीर मुद्दों को उजागर करता है. आरोप है कि महाविकास आघाड़ी सरकार के कार्यकाल में मौजूदा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को झूठे मामलों में उलझाकर गिरफ्तार कराने की साजिश रची गई. इस कथित साजिश की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब विधानसभा के भीतर सवाल उठे, फिर स्टिंग वीडियो, गवाहों पर दबाव और अब एक विस्तृत SIT रिपोर्ट सामने आई. इस पूरे घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है.
विधानसभा से उठा सवाल, यहीं से शुरू हुई कहानी
इस पूरे विवाद की शुरुआत 2024 में तब हुई, जब विधान परिषद में सदस्य प्रवीण दरेकर ने गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने सदन में कहा कि पिछली सरकार के दौरान राजनीतिक बदले की भावना से कुछ बड़े नेताओं को कानूनी मामलों में फंसाने की कोशिश की गई. यह आरोप साधारण नहीं था, क्योंकि इसमें सीधे-सीधे सत्ता में बैठे लोगों और पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े किए गए थे. दरेकर के बयान के बाद यह मामला सिर्फ राजनीतिक बहस नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी जांच की मांग तेज हो गई. यहीं से इस पूरे प्रकरण ने एक अलग दिशा पकड़ ली और सरकार को औपचारिक कदम उठाने पड़े.
स्टिंग वीडियो का दावा और कारोबारी की भूमिका
विवाद को नया मोड़ तब मिला जब व्यवसायी संजय पुनमिया सामने आए. उन्होंने दावा किया कि उनके पास एक स्टिंग वीडियो है, जिसमें मुंबई पुलिस के एक सेवानिवृत्त अधिकारी कथित तौर पर यह स्वीकार करते नजर आते हैं कि राजनीतिक दबाव में कुछ मामलों को दोबारा खोला गया. इस वीडियो में यह संकेत दिया गया कि मकसद सिर्फ जांच नहीं, बल्कि कुछ खास नेताओं को आरोपी बनाना था. पुनमिया का कहना था कि यह पूरा खेल सत्ता के इशारे पर खेला गया. इस दावे ने मामले को और गंभीर बना दिया और इसे कानूनी दायरे में ले जाने की जमीन तैयार हो गई.
हाईकोर्ट पहुंचा मामला, न्यायिक जांच की एंट्री
मामला तब और पेचीदा हो गया जब कुछ एफआईआर को रद्द कराने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया. इस दौरान अदालत के सामने वही स्टिंग वीडियो भी पेश किया गया, जिसे लेकर पहले से चर्चा चल रही थी. शिकायतकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जिन मामलों को आधार बनाकर कार्रवाई की जा रही थी, वे राजनीतिक दबाव में दर्ज हुए थे. कोर्ट में चली इस सुनवाई ने प्रशासन को मजबूर किया कि वह पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराए. इसी के बाद राज्य के गृह विभाग ने SIT गठित करने का फैसला लिया.
SIT जांच और पुलिस अधिकारियों पर गंभीर सवाल
राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल ने पूरे मामले की परत-दर-परत जांच की. जांच में सामने आया कि एक पुराने केस को दोबारा खोलने की प्रक्रिया सामान्य नहीं थी. रिपोर्ट के अनुसार, चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद पुनः जांच का रास्ता अपनाया गया और इसी दौरान कुछ नेताओं के नाम जोड़ने का दबाव बनाया गया. SIT ने इस पूरे घटनाक्रम को नियमों के खिलाफ बताया और कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जांच के नाम पर गवाहों को प्रभावित करने की कोशिशें हुईं, जो कानून के गंभीर उल्लंघन की श्रेणी में आता है.
फॉरेंसिक जांच, गायब लॉगबुक और सबूतों की कड़ी
SIT ने सिर्फ बयानों पर भरोसा नहीं किया, बल्कि तकनीकी सबूतों की भी जांच कराई. ऑडियो और वीडियो क्लिप्स को फॉरेंसिक लैब भेजा गया, जहां उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि हुई. इसके अलावा एक सरकारी वाहन की लॉगबुक के कुछ पन्ने गायब पाए गए, जिसे जांच एजेंसी ने सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका के रूप में देखा. इन तथ्यों ने मामले को और मजबूत कर दिया और यह संकेत दिया कि सिर्फ बयान ही नहीं, बल्कि रिकॉर्ड्स के स्तर पर भी गड़बड़ी हुई थी.
अब आगे क्या? कार्रवाई के संकेत
SIT की रिपोर्ट अब राज्य सरकार को सौंप दी गई है. सूत्रों के मुताबिक, इस रिपोर्ट के आधार पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है. संभावना जताई जा रही है कि एफआईआर दर्ज हो सकती है और आगे की जांच अन्य एजेंसियों को भी सौंपी जा सकती है. यह मामला सिर्फ दो नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि सत्ता और सिस्टम के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए. आने वाले दिनों में इस रिपोर्ट पर सरकार का अगला कदम महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा तय कर सकता है.

