26 साल से अटका सोन नदी जल विवाद सुलझा, बिहार-झारखंड के बीच MoU पर हुए हस्ताक्षर
बिहार और झारखंड के बीच 26 साल पुराना सोन नदी जल विवाद खत्म हो गया है. नए समझौते के तहत बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF पानी मिलेगा. इससे सिंचाई, पेयजल और इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को लेकर रास्ता साफ होने की उम्मीद है.

Ranchi: बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर करीब 26 वर्षों से चला आ रहा विवाद अब खत्म हो गया है. नई दिल्ली में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए. समझौते के मुताबिक बिहार को 5.75 मिलियन एकड़ फीट (MAF), जबकि झारखंड को 2 MAF पानी मिलेगा. यह बंटवारा 1973 के बाणसागर समझौते के तहत अविभाजित बिहार को मिले 7.75 MAF पानी में से किया गया है. लंबे समय से लंबित इस समझौते को पूर्वी भारत के महत्वपूर्ण जल विवाद के समाधान के तौर पर देखा जा रहा है. इससे दोनों राज्यों के किसानों और आम लोगों को सिंचाई व पेयजल के क्षेत्र में लाभ मिलने की उम्मीद है.
क्या था सोन नदी जल विवाद?
सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद की जड़ 1973 के बाणसागर समझौते से जुड़ी है. इस समझौते में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अविभाजित बिहार के बीच सोन नदी के पानी का बंटवारा तय किया गया था. उस समय बिहार को 7.75 MAF, मध्य प्रदेश को 5.25 MAF और उत्तर प्रदेश को 1.35 MAF पानी आवंटित किया गया था. वर्ष 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड नया राज्य बना. इसके बाद झारखंड ने अविभाजित बिहार के हिस्से में आए सोन नदी के पानी में अपना हिस्सा मांगा. झारखंड का तर्क था कि राज्य के गठन के बाद बिहार को मिले पानी का बंटवारा दोनों राज्यों के बीच होना चाहिए. वहीं, बिहार 1973 के समझौते का हवाला देकर पूरे 7.75 MAF पानी पर अपना अधिकार बताता रहा. इसी मतभेद के कारण दोनों राज्यों के बीच लंबे समय तक सहमति नहीं बन सकी.
अब बिहार और झारखंड को कितना मिलेगा पानी?
नए समझौते के तहत 1973 के बाणसागर समझौते में अविभाजित बिहार को मिले कुल 7.75 MAF पानी को बिहार और झारखंड के बीच बांट दिया गया है. इसमें बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF पानी मिलेगा. यानी कुल उपलब्ध 7.75 MAF पानी का बड़ा हिस्सा बिहार के हिस्से में रहेगा, जबकि झारखंड को भी तय हिस्सा मिलेगा. इस बंटवारे पर वर्ष 2025 में रांची में हुई पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक के दौरान सहमति बनी थी. अब इसे औपचारिक समझौते का रूप दे दिया गया है. करीब 26 वर्षों से चले आ रहे विवाद के समाप्त होने से दोनों राज्यों के बीच जल संसाधन को लेकर समन्वय बढ़ने की उम्मीद है. समझौते को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे भविष्य में सोन नदी बेसिन से जुड़ी सिंचाई और जल परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
बिहार के इन जिलों को मिलेगा फायदा
सोन नदी जल बंटवारे के समझौते का सीधा असर बिहार के दक्षिण और पश्चिमी हिस्सों पर पड़ने की उम्मीद है. समझौते के बाद भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना समेत कई जिलों में सिंचाई तथा पेयजल के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ सकती है. सोन नदी दक्षिण बिहार की कृषि व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इसके पानी पर बड़ी संख्या में किसान निर्भर हैं. लंबे समय से जल बंटवारे के विवाद के कारण कई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में अड़चनें थीं. अब राज्यों के बीच सहमति बनने के बाद जल संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल का रास्ता खुल सकता है. खासतौर पर इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को लेकर उम्मीद बढ़ी है. यदि परियोजना आगे बढ़ती है तो दक्षिण बिहार के बड़े क्षेत्र में सिंचाई क्षमता बढ़ सकती है और किसानों को कृषि के लिए अधिक भरोसेमंद जल स्रोत उपलब्ध हो सकता है.
झारखंड के पलामू और गढ़वा को भी मिलेगा लाभ
समझौते से झारखंड के सोन नदी बेसिन से जुड़े इलाकों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है. पलामू और गढ़वा जैसे जिलों में सिंचाई और पेयजल की जरूरत को पूरा करने के लिए सोन नदी के जल का इस्तेमाल किया जा सकेगा. झारखंड लंबे समय से अविभाजित बिहार के हिस्से में मिले पानी में अपने हिस्से की मांग करता रहा था. अब 2 MAF पानी का हिस्सा तय होने से राज्य को अपने जल संसाधन प्रबंधन की योजना बनाने में मदद मिलेगी. इससे सोन नदी बेसिन से जुड़े क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है. साथ ही ग्रामीण इलाकों में पेयजल की उपलब्धता सुधारने की संभावना भी है. दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे पर सहमति होने से भविष्य में संबंधित परियोजनाओं की योजना और क्रियान्वयन में भी बेहतर समन्वय की उम्मीद है. इस समझौते को झारखंड के लिए लंबे समय से लंबित मांग के समाधान के तौर पर भी देखा जा रहा है.
इंद्रपुरी जलाशय परियोजना के लिए खुला रास्ता
सोन नदी जल विवाद का असर बिहार की महत्वाकांक्षी इंद्रपुरी जलाशय परियोजना पर भी पड़ा था. जल बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच सहमति नहीं होने के कारण परियोजना को आगे बढ़ाने में कई तरह की बाधाएं सामने आती रही थीं. वर्ष 2022 में केंद्रीय जल आयोग ने परियोजना का प्रस्ताव वापस कर दिया था. इसके पीछे सह-बेसिन राज्यों से एनओसी और जल बंटवारे से जुड़े विवाद का समाधान जरूरी होना प्रमुख कारण था. अब बिहार और झारखंड के बीच औपचारिक समझौता होने के बाद इस परियोजना को आगे बढ़ाने की राह आसान होने की उम्मीद है. इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को दक्षिण बिहार में सिंचाई व्यवस्था मजबूत करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है. परियोजना के आगे बढ़ने से सोन नदी के पानी का बेहतर प्रबंधन और भंडारण संभव हो सकता है. इससे कृषि क्षेत्र को फायदा मिलने के साथ कई इलाकों में पेयजल उपलब्धता भी बेहतर हो सकती है.
अमित शाह ने समझौते को बताया सहकारी संघवाद की मिसाल
समझौते के दौरान केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने इसे सहकारी संघवाद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘टीम इंडिया’ की परिकल्पना का उत्कृष्ट उदाहरण बताया. उन्होंने कहा कि यदि सभी राज्य टीम इंडिया की भावना के साथ आगे बढ़ें तो कोई भी समस्या ऐसी नहीं है, जिसका समाधान न निकाला जा सके. अमित शाह के मुताबिक बिहार और झारखंड के बीच हुए इस समझौते से पूर्वी भारत के एक लंबे समय से चले आ रहे जल विवाद का समाधान हुआ है. उन्होंने कहा कि इससे दोनों राज्यों के बड़े ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों किसानों को सिंचाई के लिए पानी मिल सकेगा और लोगों के लिए पेयजल की उपलब्धता भी बढ़ेगी. इस मौके पर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी समेत केंद्र और दोनों राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे. दोनों मुख्यमंत्रियों ने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए.
सोन नदी दक्षिण बिहार के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
सोन नदी को दक्षिण बिहार की जल जीवन रेखा माना जाता है. इसका उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक क्षेत्र की पहाड़ियों से होता है. नदी मध्य प्रदेश से निकलने के बाद उत्तर प्रदेश और झारखंड के क्षेत्रों से गुजरती हुई बिहार में प्रवेश करती है. बिहार में यह नदी कई जिलों के कृषि क्षेत्र को सिंचाई का पानी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. आगे चलकर सोन नदी मनेर के पास गंगा नदी में मिल जाती है. सोन के पानी पर दक्षिण बिहार के बड़े हिस्से की कृषि व्यवस्था काफी हद तक निर्भर करती है. यही वजह है कि इसके जल बंटवारे का मुद्दा केवल दो राज्यों के बीच प्रशासनिक विवाद नहीं, बल्कि किसानों, सिंचाई और पेयजल से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय रहा है. अब बिहार और झारखंड के बीच जल बंटवारे पर समझौता होने के बाद सोन नदी के जल संसाधन के अधिक प्रभावी और समन्वित इस्तेमाल की उम्मीद बढ़ गई है.

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