सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फैक्ट्री और खदानों में चलने वाली मशीनों पर नहीं लगेगा रोड टैक्स
सुप्रीम कोर्ट ने इंडस्ट्रियल और कंस्ट्रक्शन सेक्टर की बड़ी कंपनियों को बड़ी राहत दी है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि जो भारी मशीनरी और वाहन सार्वजनिक सड़कों पर नहीं चलते, उन्हें मोटर व्हीकल नहीं माना जाएगा और उन पर रोड टैक्स नहीं लगाया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने इंडस्ट्रियल और कंस्ट्रक्शन सेक्टर की बड़ी कंपनियों को बड़ी राहत दी है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि जो भारी मशीनरी और वाहन सार्वजनिक सड़कों पर नहीं चलते, उन्हें मोटर व्हीकल नहीं माना जाएगा और उन पर रोड टैक्स नहीं लगाया जा सकता. इस फैसले से कोल इंडिया, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL), टाटा स्टील, एलएंडटी, एसीसी और अल्ट्राटेक सीमेंट जैसी कंपनियों को सीधा लाभ मिलेगा. ये कंपनियां फैक्ट्रियों, खदानों और कंस्ट्रक्शन साइट्स के भीतर भारी मशीनों का इस्तेमाल करती हैं.
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
जस्टिस पंकज मित्तल की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि डंपर, एक्सकेवेटर, सरफेस माइनर जैसी भारी इंडस्ट्रियल और कंस्ट्रक्शन मशीनें, जो केवल बंद परिसरों जैसे फैक्ट्रियों, खदानों या निर्माण स्थलों में चलती हैं, मोटर व्हीकल की श्रेणी में नहीं आतीं. इसलिए, इन पर रोड टैक्स नहीं लगाया जा सकता.
हाई कोर्ट के फैसले को पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में गुजरात हाई कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को पलट दिया. गुजरात हाई कोर्ट ने उस समय कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट पर रोड टैक्स लगाने की अनुमति दी थी. यह मामला अल्ट्राटेक सीमेंट की अपील पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था. अदालत ने यह भी साफ किया कि अगर इस तरह की मशीनें या वाहन सार्वजनिक सड़कों पर चलते पाए गए, तो उन पर न केवल रोड टैक्स लगाया जाएगा, बल्कि जुर्माना भी वसूला जा सकता है.
संविधान का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की सातवीं अनुसूची का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्यों को केवल उन्हीं वाहनों पर टैक्स लगाने का अधिकार है, जो सार्वजनिक सड़कों पर चलते हैं. फैक्ट्री या खदानों के भीतर इस्तेमाल होने वाले विशेष वाहन इस दायरे में नहीं आते.
क्यों उठा था विवाद
दरअसल, राज्य सरकार के अधीन ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी ने फैक्ट्रियों और कंस्ट्रक्शन साइट्स पर चलने वाले भारी कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट पर रोड टैक्स की मांग की थी. इसके खिलाफ अल्ट्राटेक समेत कई कंपनियों ने अदालत का रुख किया था. इस फैसले को इंडस्ट्रियल सेक्टर के लिए एक अहम राहत के रूप में देखा जा रहा है, जिससे कंपनियों पर टैक्स का अतिरिक्त बोझ कम होगा.

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