Ranchi Dussehra 2026: 12 फीट के रावण से 70 फीट तक का सफर, जानें रांची में रावण दहन का इतिहास
रांची के मोरहाबादी मैदान में इस बार दशहरा पर 70 फीट ऊंचे रावण, 65 फीट के कुंभकर्ण और 60 फीट के मेघनाथ के पुतलों का दहन होगा. साथ ही 30×30 फीट की दो मंजिला सोने की लंका भी आकर्षण का केंद्र बनेगी.

Ranchi Dussehra 2026: रांची के मोरहाबादी मैदान में इस बार दशहरा का आयोजन भव्य होने जा रहा है. यहां 70 फीट ऊंचे रावण, 65 फीट के कुंभकर्ण और 60 फीट के मेघनाथ के पुतलों का दहन किया जाएगा. इसके साथ ही 30×30 फीट की दो मंजिला सोने की लंका भी तैयार की जाएगी. हर साल की तरह इस बार भी रावण दहन देखने के लिए बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की उम्मीद है. लेकिन रांची में रावण दहन की यह परंपरा हमेशा से इतनी भव्य नहीं थी. कभी महज 12 फीट के रावण के पुतले से शुरू हुआ यह आयोजन आज शहर के प्रमुख सांस्कृतिक उत्सवों में शामिल हो चुका है. आइए जानते हैं रांची में रावण दहन की शुरुआत कब हुई और कैसे मोरहाबादी मैदान इस आयोजन का प्रमुख केंद्र बना.
1948 में हुई थी रांची में रावण दहन की शुरुआत
रांची में रावण दहन की परंपरा की शुरुआत वर्ष 1948 में हुई थी. उस समय रांची कॉलेज के पास महात्मा गांधी मार्ग पर स्थित डाकघर के सामने परिसर में रावण का लगभग 12 फीट ऊंचा पुतला बनाया गया था. सीमित संसाधनों के बीच शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगा. समय के साथ दशहरा के मौके पर रावण दहन देखने की परंपरा मजबूत होती गई. लोगों की भागीदारी बढ़ी और यह आयोजन रांची की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गया.
खजुरिया तालाब से बारी पार्क तक पहुंचा आयोजन
वर्ष 1950 से 1955 के बीच रावण के पुतलों का निर्माण रेलवे स्टेशन के पास खजुरिया तालाब स्थित शरणार्थी शिविर में किया जाने लगा. उस दौर में रावण दहन बारी पार्क में आयोजित होता था. आज इस क्षेत्र को टाउन हॉल के आसपास के इलाके के रूप में जाना जाता है. इसके बाद पंजाबी हिंदू बिरादरी के सदस्यों ने डोरंडा स्थित राम मंदिर में पुतलों का निर्माण शुरू कराया. इससे आयोजन की तैयारियों को नया विस्तार मिला और दशहरा उत्सव में रावण दहन का महत्व लगातार बढ़ता गया.
1960 से मोरहाबादी मैदान बना रावण दहन का केंद्र
रावण दहन देखने के लिए लोगों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए वर्ष 1960 से मोरहाबादी मैदान को इस आयोजन के लिए चुना गया. इसके बाद से यहां दशहरा उत्सव का स्वरूप लगातार भव्य होता गया. पुतलों की ऊंचाई बढ़ने लगी और आयोजन की तैयारियों का दायरा भी विस्तृत होता गया. धीरे-धीरे मोरहाबादी मैदान रांची में रावण दहन के प्रमुख स्थल के रूप में स्थापित हो गया. आज पंजाबी हिंदू बिरादरी की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न समुदायों के लोग शामिल होते हैं. यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बन चुका है.
12 फीट से 70 फीट तक पहुंचा रावण का सफर
रांची में रावण दहन की यात्रा अपने आप में खास है. वर्ष 1948 में जहां 12 फीट के रावण के पुतले से इसकी शुरुआत हुई थी, वहीं अब यह आयोजन विशाल पुतलों और आकर्षक सजावट के लिए जाना जाता है. इस बार मोरहाबादी मैदान में 70 फीट का रावण, 65 फीट का कुंभकर्ण और 60 फीट का मेघनाथ आकर्षण का केंद्र होंगे. इसके अलावा 30×30 फीट की दो मंजिला सोने की लंका भी तैयार की जाएगी. इन विशाल पुतलों और लंका की प्रस्तुति के जरिए आयोजन को और भव्य बनाने की तैयारी है. हालांकि, आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं और कार्यक्रम के समय की आधिकारिक जानकारी के अनुसार ही दर्शकों को अपनी योजना बनानी चाहिए.
बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है दशहरा
दशहरा यानी विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया था. इसी घटना की स्मृति में रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है. रांची में भी हर साल हजारों लोग इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं. जब रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले आग की लपटों में समाते हैं, तो यह दृश्य लोगों को सत्य, धर्म और अच्छाई के मार्ग पर चलने का संदेश देता है. इस तरह 12 फीट के पुतले से शुरू हुई रांची के रावण दहन की परंपरा आज दशकों का सफर तय कर शहर की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है. इस बार भी मोरहाबादी मैदान में होने वाला आयोजन दशहरा उत्सव का प्रमुख आकर्षण रहने की उम्मीद है.



