“नेहरू ने वंदे मातरम के टुकड़े कर दिये, राष्ट्रगीत का विरोध कांग्रेस के खून में है” राज्यसभा में अमित शाह का ताबड़तोड़ हमला
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि वंदे मातरम पर चर्चा की जरूरत तब भी थी जब गीत बनी थी, आजादी के आंदोलन में भी थी, आज भी है और 2047 में जब महान भारत बनेगा तब भी रहेगी.

भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर संसद में इसपर चर्चा हो रही है. सोमवार को लोकसभा में चर्चा के बाद मंगलवार को राज्यसभा में चर्चा हो रही है. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि वंदे मातरम पर चर्चा की जरूरत तब भी थी जब गीत बनी थी, आजादी के आंदोलन में भी थी, आज भी है और 2047 में जब महान भारत बनेगा तब भी रहेगी. यह अमर कृति मां भारती के प्रति कर्तव्य और समर्पण का भाव जगाने वाली कृति है, लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वंदे मातरम् के टुकड़े कर दिए.
वंदे मातरम की स्वर्ण जयंती और दो टुकड़े
शाह ने कहा कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम के जरिए हमारी संस्कृति, देश को माता मानकर उसकी आराधना करने की परंपरा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को प्रतिष्ठित किया. सारे प्रतिबंधों को पार कर, अत्याचार और अनेक प्रताड़नाएं झेलकर भी वंदे मातरम देशवासियों के मन को छू गया और कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैल गया. हमारी समृद्धि, हमारी सुरक्षा, ज्ञान-विज्ञान सब भारत माता की ही कृपा हैं. इतना बड़ा संकल्प बंकिम बाबू ने रखा. दुर्गा की वीरता, लक्ष्मी की सम्पन्नता और सरस्वती की मेधा, यह हमारी मिट्टी ही दे सकती है. वंदे मातरम की स्वर्ण जयंती जब हुई, तब जवाहरलाल नेहरू ने इसके दो टुकड़े कर इसे दो अंतरों तक सीमित कर दिया. वहीं से तुष्टीकरण की शुरुआत हुई. अगर वंदे मातरम के दो टुकड़े कर तुष्टीकरण की शुरुआत नहीं हुई होती तो देश का विभाजन भी नहीं होता.
वंदे मातरम भारत के पुनर्जन्म का मंत्र
अमित शाह ने कहा कि श्री अरविन्द ने कहा था कि वंदे मातरम भारत के पुनर्जन्म का मंत्र है. उन्होंने यह भी कहा कि देश को ऐसे मंत्र की आवश्यकता थी, और उसे प्रकट करने के लिए ही बंकिम बाबू को ईश्वर ने इस धरती पर भेजा था. दुनिया में कई देशों की सीमाएं अधिनियमों ने तय की हैं, पर हमारे देश की सीमाओं को हमारी संस्कृति ने बुना है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्थापित करने का काम आजदी के आंदोलन के दिनों में बंकिम बाबू ने किया. वंदे मातरम पर लगे कई प्रतिबंधों के बाद बंकिम बाबू ने कहा था कि मुझे कोई आपत्ति नहीं है यदि मेरी सारी रचनाएं गंगा में बहा दी जाएं, पर वंदे मातरम का यह मंत्र अनंत काल तक जीवित रहेगा और भारत के पुनर्निर्माण का यह मंत्र बनेगा.

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