वेनेजुएला को लेकर अमेरिका की कार्रवाई ने वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में नई हलचल पैदा कर दी है. राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के सत्ता से बाहर होने और अमेरिका के सीधे हस्तक्षेप के दावों के बाद यह सवाल गहराने लगा है कि क्या यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन की कार्रवाई है या दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार पर निर्णायक दांव. विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है—कुछ इसे अमेरिका के लिए रणनीतिक जीत बता रहे हैं, तो कुछ इसे वैश्विक टकराव की शुरुआत मान रहे हैं.
वेनेजुएला संकट और अमेरिका का बड़ा दांव
अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में किए गए सैन्य कदम और मादुरो परिवार की गिरफ्तारी की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं. वाशिंगटन की ओर से यह साफ संकेत दिए गए हैं कि वह वेनेजुएला के ऊर्जा क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने जा रहा है. इसके साथ ही यह संकट केवल राजनीतिक न रहकर आर्थिक और रणनीतिक लड़ाई में तब्दील होता दिख रहा है.
303 अरब बैरल तेल: असली वजह क्या है?
वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित कच्चा तेल भंडार माना जाता है, जिसका अनुमान करीब 303 अरब बैरल है. मौजूदा वैश्विक कीमतों पर भी इसकी कीमत कई ट्रिलियन डॉलर बैठती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की दिलचस्पी का केंद्र यही विशाल ऊर्जा संसाधन हैं. यदि उत्पादन दोबारा बड़े पैमाने पर शुरू होता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति में बड़ा बदलाव आ सकता है.
एक्सपर्ट बोले—तेल सस्ता हुआ तो अमेरिका को फायदा
अमेरिकी निवेशक और बिजनेस एनालिस्ट बिल एकमैन का मानना है कि वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन से वैश्विक तेल की कीमतों पर दबाव पड़ेगा. उनका तर्क है कि तेल सस्ता होने से अमेरिका जैसे उपभोक्ता देशों को राहत मिलेगी. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कम कीमतें रूस जैसी तेल-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए मुश्किलें बढ़ा सकती हैं.
रूस के लिए क्यों माना जा रहा है झटका?
रूस की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तेल और गैस निर्यात पर टिका है. अगर वेनेजुएला से तेल की सप्लाई बढ़ती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा तेज होगी. इससे रूसी तेल की मांग घट सकती है, खासकर तब जब रूस पहले से ही रियायती दरों पर कच्चा तेल बेच रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय में यह रूस की आर्थिक स्थिति और उसकी वैश्विक रणनीति को प्रभावित कर सकता है.
लेकिन सभी एक्सपर्ट सहमत नहीं
कुछ विश्लेषकों ने इस सोच पर सवाल उठाए हैं. अमेरिकी ऊर्जा विशेषज्ञ क्रिस मार्टेंसन का कहना है कि बहुत सस्ता तेल अमेरिका के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है. उनका तर्क है कि अमेरिकी शेल ऑयल सेक्टर पहले से ही दबाव में है और कीमतें ज्यादा गिरने पर घरेलू उत्पादन को झटका लग सकता है. कई उत्पादकों के लिए 65 डॉलर प्रति बैरल से कम कीमत पर नया निवेश फायदेमंद नहीं रहता.
US कंपनियों की वेनेजुएला में एंट्री की तैयारी
अमेरिकी नेतृत्व ने संकेत दिए हैं कि बड़ी अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला के क्षतिग्रस्त इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश कर सकती हैं. दावा किया जा रहा है कि अरबों डॉलर लगाकर उत्पादन दोबारा शुरू किया जाएगा. अमेरिका का तर्क है कि इससे वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को भी फायदा होगा, जबकि ऊर्जा से होने वाली आमदनी से अमेरिकी खर्चों की भरपाई की जा सकेगी.
रूस-चीन के हितों पर सीधा असर
वेनेजुएला के रूस और चीन से लंबे समय से मजबूत रिश्ते रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका वहां स्थायी प्रभाव स्थापित करता है, तो यह दक्षिण अमेरिका में रूस और चीन दोनों के रणनीतिक हितों के लिए झटका होगा. खासतौर पर चीन, जिसने वेनेजुएला में बड़े पैमाने पर निवेश किया है, इस घटनाक्रम को करीब से देख रहा है.
विश्व युद्ध जैसी स्थिति की चेतावनी
कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने चेताया है कि यह टकराव आगे चलकर बड़े सैन्य संघर्ष का रूप ले सकता है. अगर रूस या चीन सीधे तौर पर अमेरिका को चुनौती देते हैं, तो हालात और बिगड़ सकते हैं. यूक्रेन युद्ध से पहले ही वैश्विक तनाव ऊंचाई पर है और वेनेजुएला संकट उसमें नई चिंगारी जोड़ सकता है.
आगे क्या?
फिलहाल इतना साफ है कि वेनेजुएला सिर्फ एक देश का मामला नहीं रहा. यह तेल, सत्ता और वैश्विक प्रभाव की लड़ाई बन चुका है. आने वाले दिनों में यह तय होगा कि यह अमेरिका के लिए रणनीतिक जीत साबित होती है या दुनिया को एक नए बड़े टकराव की ओर ले जाती है.


