Deoghar News: 400 साल पुरानी परंपरा का साक्षी है बैजनाथपुर बिशनपुर का माता रानी मंदिर, आज भी होती है तांत्रिक विधि से पूजा
देवघर जिले के सारवां प्रखंड स्थित बैजनाथपुर बिशनपुर का माता रानी मंदिर करीब 400 साल पुरानी धार्मिक परंपरा का साक्षी है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, राजा मर्दन सिंह ने यहां पूजा की शुरुआत की थी. आज भी उनके वंशज इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.

Report:-Sunil Kumar Jha
देवघर:- झारखंड के देवघर जिले में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनकी पहचान सदियों पुरानी परंपराओं और लोक आस्था से जुड़ी हुई है. सारवां प्रखंड की कुशमाहा पंचायत के बैजनाथपुर बिशनपुर गांव स्थित माता रानी मंदिर भी इन्हीं में से एक है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर में करीब 400 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है. कहा जाता है कि राजा मर्दन सिंह ने यहां पूजा की शुरुआत की थी और आज भी उनके वंशज इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं. महाअष्टमी पर दंड देने की परंपरा और महानवमी पर बलि की रस्म इस मंदिर की विशिष्ट पहचान मानी जाती है. इसके अलावा, दशमी पर प्रतिमा को कंधे पर उठाकर विसर्जन के लिए ले जाना श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और सामूहिक सहभागिता को दर्शाता है.
राजा मर्दन सिंह ने शुरू की थी पूजा की परंपरा
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, करीब चार सौ वर्ष पहले राजा मर्दन सिंह ने बैजनाथपुर बिशनपुर में माता रानी की स्थापना कर पूजा-अर्चना की शुरुआत की थी. मान्यता है कि वे बाबा मंदिर के भीतरखंडा से मां का अवशेष लेकर शर्मा क्षेत्र की ओर जा रहे थे. इसी दौरान उन्हें मां की स्थापना नदी के इसी पार करने का संकेत मिला. इसके बाद उन्होंने यहां मंदिर बनवाकर पूजा की व्यवस्था शुरू की.
समय के साथ मंदिर के स्वरूप में बदलाव आया, लेकिन पूजा की परंपरा बनी रही. राजा मर्दन सिंह की सातवीं पीढ़ी के वंशज युवराज राजेश सिंह आज भी इस धार्मिक विरासत को संभाल रहे हैं. पंडित जय नारायण पांडेय के मार्गदर्शन में यहां तांत्रिक विधि-विधान से पूजा की जाती है.
महाअष्टमी और महानवमी के अनुष्ठान हैं खास
माता रानी मंदिर में नवरात्र के दौरान विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं. महाअष्टमी के दिन दंड देने की परंपरा निभाई जाती है, जबकि महानवमी पर स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार बकरों की बलि दी जाती है. इन परंपराओं का पालन लंबे समय से किया जा रहा है.
नवरात्र के दिनों में आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं. भक्त मां के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं. मंदिर से जुड़ी मान्यताएं स्थानीय लोकविश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हैं.
सातवीं पीढ़ी भी संभाल रही धार्मिक विरासत
इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां पूजा की परंपरा केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी इसका पालन किया जा रहा है. राजा मर्दन सिंह के वंशजों ने धार्मिक रीति-रिवाजों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर को नया और भव्य स्वरूप भी दिया गया है. नवरात्र के अवसर पर पूजा-पाठ के साथ भजन-कीर्तन और अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. इससे मंदिर में श्रद्धालुओं की भागीदारी बढ़ती है और स्थानीय संस्कृति को भी प्रोत्साहन मिलता है.
कंधे पर प्रतिमा लेकर चार किलोमीटर दूर होता है विसर्जन
माता रानी मंदिर की एक अनूठी परंपरा दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन से जुड़ी हुई है. स्थानीय रीति के अनुसार, दशमी के दिन प्रतिमा को वाहन या ठेले पर ले जाने के बजाय श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर ले जाते हैं.
इस दौरान करीब चार किलोमीटर की दूरी तय की जाती है और इसके बाद रानी पोखर में प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है. यह परंपरा श्रद्धालुओं के समर्पण और सामूहिक आस्था का प्रतीक मानी जाती है. वर्षों से चली आ रही इस रस्म के कारण मंदिर की पहचान आसपास के क्षेत्रों में विशिष्ट बनी हुई है.
राजा मर्दन सिंह से जुड़ी हैं कई स्थानीय मान्यताएं
राजा मर्दन सिंह का नाम क्षेत्र की कई जनश्रुतियों और ऐतिहासिक मान्यताओं में मिलता है. स्थानीय कथाओं के अनुसार, उन्होंने सारवां के कुर्थी बारी क्षेत्र में संथाल विद्रोह के दौरान विरोधियों का सामना किया था. बाबा मंदिर के प्रवेश द्वारों से भी उनसे जुड़ी स्मृतियों का उल्लेख किया जाता है. हालांकि, इन ऐतिहासिक प्रसंगों की पुष्टि के लिए स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाणों की जरूरत है.




