₹370 बिरयानी विवाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, स्टैंड-अप कॉमेडी, पॉडकास्ट और सोशल मीडिया कंटेंट के लिए नियम बनाने की मांग
₹370 बिरयानी विवाद, रणवीर इलाहाबादिया और India's Got Latent जैसे मामलों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है. याचिका में सोशल मीडिया, स्टैंड-अप कॉमेडी, पॉडकास्ट, लाइव स्ट्रीमिंग और AI आधारित कंटेंट के लिए व्यापक नियामक ढांचा तैयार करने की मांग की गई है.

New Delhi: सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने वाले कंटेंट, स्टैंड-अप कॉमेडी, पॉडकास्ट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार सामग्री के नियमन का मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. शीर्ष अदालत में दायर एक जनहित याचिका (PIL) में केंद्र सरकार को निर्देश देकर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने वाले कंटेंट के लिए व्यापक रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करने की मांग की गई है. याचिका में हाल के चर्चित '₹370 बिरयानी' विवाद, रणवीर इलाहाबादिया विवाद, India's Got Latent प्रकरण और सोशल मीडिया पर वायरल हुई कथित भ्रामक सामग्रियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था अधिकतर मामलों में तब सक्रिय होती है, जब विवादित या गलत जानकारी पहले ही लाखों लोगों तक पहुंच चुकी होती है. याचिकाकर्ता का कहना है कि डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने वाला स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार किया जाना समय की आवश्यकता है.
सुप्रीम कोर्ट में क्या मांग रखी गई है?
यह जनहित याचिका अधिवक्ता विशाल तिवारी ने दायर की है. याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देकर स्टैंड-अप कॉमेडी, पॉडकास्ट, लाइव स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और AI आधारित कंटेंट के लिए एक व्यापक नियामक व्यवस्था तैयार करने की मांग की गई है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गए हैं, बल्कि वे सामाजिक सोच, सार्वजनिक विमर्श और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करते हैं. ऐसे में तकनीक के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए स्पष्ट नियम और जवाबदेही तय करना जरूरी है.
'₹370 बिरयानी' से लेकर India's Got Latent तक का हवाला
याचिका में हाल ही में चर्चा में आए '₹370 बिरयानी' विवाद को प्रमुख उदाहरण के रूप में रखा गया है. इसमें कहा गया है कि किसी स्टैंड-अप शो या डिजिटल मंच पर कही गई बात जब सोशल मीडिया के एल्गोरिदम के जरिए बड़े स्तर पर प्रसारित होती है, तो उसका प्रभाव मूल संदर्भ से कहीं अधिक व्यापक हो जाता है. इसके अलावा रणवीर इलाहाबादिया से जुड़े विवाद, India's Got Latent प्रकरण तथा सोशल मीडिया पर वायरल हुई कुछ कथित भ्रामक पोस्ट का भी उल्लेख किया गया है. याचिका में कहा गया है कि ऐसे मामलों में फैक्ट-चेक या आधिकारिक स्पष्टीकरण आने तक लाखों लोग उस सामग्री को देख और साझा कर चुके होते हैं, जिससे समाज और सार्वजनिक संस्थाओं पर असर पड़ता है.
बच्चों की सुरक्षा और विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग
याचिका में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित भ्रामक, अपमानजनक और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले कंटेंट की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग भी की गई है. साथ ही 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों पर सोशल मीडिया के प्रभाव का अध्ययन, आयु सत्यापन (Age Verification) प्रणाली की समीक्षा और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए स्वतंत्र तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया गया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि एल्गोरिदम आधारित प्लेटफॉर्म अक्सर सनसनीखेज और विवादित सामग्री को तेजी से बढ़ावा देते हैं, जिसका प्रभाव बच्चों और युवाओं पर अधिक पड़ता है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजरें
फिलहाल यह जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है. यदि शीर्ष अदालत केंद्र सरकार से जवाब तलब करती है या कोई दिशा-निर्देश जारी करती है, तो देश में सोशल मीडिया, स्टैंड-अप कॉमेडी, पॉडकास्ट, लाइव स्ट्रीमिंग और AI आधारित डिजिटल कंटेंट के नियमन को लेकर नई बहस शुरू हो सकती है. साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए भविष्य में नए कानूनी प्रावधानों का रास्ता भी खुल सकता है.

